Sunday, 8 April 2018

मेरे चंद दोस्त




मेरे चंद दोस्त

खट्टे मीठे, गोल मटोल, चटपटे अनारदाने जैसे दोस्त
आड़े तिरछे, मुड़े तुड़े, रस्सी की मजबूत अकड़न जैसे सयाने मेरे दोस्त
कभी इधर कभी उधर, मूँगफली के छिलकों जैसे हल्के मगर सेहतमंद दोस्त
और कभी स्याह रात के सिपाही जैसे सजग, जुगनू मेरे दोस्त
कभी फकीर का कशकोल देखा है तुमने?
जो मांगो वो मिले, जो ना मांगो वो ज़्यादा, ऐसे धनी हैं, मेरे गरीब दोस्त,

एक दोस्त है रायचंद
हर बात पे अपनी राय रखता है,
कितना भी चुप करा लो, बकबक करते नहीं थकता है
कल exam है? अमां, किताब से बस पाँच सवाल लगा लो, वहीं से पूछा जाएगा
Laptop खराब पड़ा है? फिक्र क्यों है भाई, किराए का आ जाएगा
Girlfriend नाराज़ है? Roses और Chocolates भेजो, फिर नहीं सताएगी
Dad ने bike वापस ले ली? थोड़ा सब्र करो, Mom नयी दिलाएगी
आल-तू जलाल-तू, हर राय है फालतू,
जो बाल बाल बच जाता मैं, अपनी राय से अब मुझे मुसीबत में डाल तू,
पर करें भी तो क्या, दोस्त जो है तू मेरा!

एक दोस्त है प्रेमचंद
रग-रग में उसके इत्र है, बस महिलाएं उसकी मित्र है
करता खतों में बातें है, chatting dating की रातें हैं
कुछ पढ़ भी लो, दोस्त? इश्क़ से बड़ा कोई school नहीं
कुछ काम वाम सीख लो? मुश्क से बेहतर कोई teacher नहीं
बर्बाद हो जाओगे? ये आग का दरिया है बस डूब के जाना है
होश में आओ, यार! अब ज़िंदगी क्या है, बस रूठना मनाना, उसकी यादों में खो जाना है
उफ़्फ़! करें भी तो क्या, जी दोस्त जो है वो मेरा!


फिर एक दोस्त है ज्ञानचंद
किताबों की दुनिया में रहता है, बीस की पिद्दी सी उम्र और बातें अस्सी की करता है
चलता घूमता encyclopaedia सा, गोया ज्ञान ही बांटता फिरता है
आकछूँ, सर्दी-खांसी-नाक भी बंद!! C’mon dude, its bronchitis of upper respiratory system,
Wow, गोलगप्पे! Stop! भारत के 89% लोग नॉन-communicable disease के शिकार हैं,
अहा बारिश की पहली बूंदे! Season of retreating monsoon from the West Coast of India,
तुम्हारा सर फोड़ डालूँ क्या? Dare you! IPC section 307, criminal prosecution for attempt to murder
Seriously? अपना फोड़ डालूँ क्या? Suicide क्राइम है, डिप्रेशन का साइन है, इसलिए सोचो भी मत!
हे ईश्वर,  करें भी तो क्या, दोस्त जो है वो मेरा!


एक और दोस्त है, रूपचन्द
Parties की वो जान है, हम कुरूप दोस्तों के बीच की शान है
Stylish कपड़ों की चमक, और playboy perfume की सख्त गमक,
जूते कपड़े gadgets, hairless chest, सब उसकी आन और बान है
कॉलेज जाने में लेट हो रहा है तो क्या? बस, ज़रा बाल काढ़ लूँ
Allen Solly, Van Huesan, Tommy Hilfiger, अपना wardrobe तो संवार लूँ
भाई के जैसा ‘being human’ bracelet है और Bieber जैसे बाल
Bi-monthly facial regime, daily gym और प्रोटीन शेक का है कमाल
कहीं आना हो, जाना हो, ले दे के वही एक सवाल? ”यार, दिख कैसा रहा हूँ मैं?
थोड़ा silly थोड़ा dilly है, पर करें भी तो क्या, दोस्त जो है वो मेरा!


एक और मज़ेदार दोस्त है, पाकचंद
खान पान का शौकीन है, जो वज़न घटाने को कह दो तो पाकचंद की तौहीन है
जब हम लेते है एक pizza, वो लेता है चार
जब हम लें एक scoop icecream, वो लेता बार बार
चाहे माँ के लड्डू हों या हों restaurant में dine
Beer, malt, whiskey हो, या हो chilled wine
कुछ ऐसा नहीं जो उसे भाता न हों, वो उपजा भी नहीं जो वो खाता ना हो
हमारे टिफ़िन बॉक्स का शिकारी है, Food Fest का सबसे चुस्त खिलाड़ी है,
गोल-मटोल बेडॉल है, पर करें भी तो क्या, दोस्त जो है वो मेरा!


एक दोस्त है लेखचंद
हर वक़्त कुछ खोया रहता है, ख्वाबों पे सोया करता है
हर रात एक सुरमाया चुनता है, हर दिन एक कहानी बुनता है
कविताओ में बसती उसकी जान है, छंदो में कैद एक टुकड़ा आसमान है
शब्दों का माया जाल है, किताबो पर वो निहाल है
जो टूट गए वो नाज़ुक शीशे से ख्वाब, तो रक्त पोथी लिख जाएगा
जो छूट गए कलम के स्याही के छाप, तो अंतर्द्वंद की यलगार गाथा सुनाएगा
कुछ सनकी कुछ अड़ियल है, पर करें भी तो क्या, दोस्त जो है वो मेरा!


ऐसे ही कुछ सिरफिरे से चंद और है,
रामचंद, गोपीचन्द।
सोमवार-शुक्रवार व्रत रखते हैं, मंगल-बृहस्पति-शनि को मांस नहीं खाते, बुध-रवी को सोमरस का अमूमन पान करते हैं, मेरे ईश्वर-भक्त दोस्त....
फूलचंद, गुलाबचंद।
बस नाम के ही पुष्प जैसे, ना ही रसिक, ना ही सुगंधित, गालियों की दुकान है, वो मेरे कोमल दोस्त....
रागचंद, सुरचंद।
जो गीत सुनाये तो शीशा चटक जाए, जो गुनगुनाए तो गागर फूट जाए, गले में bullet bike के इंजिन से सुरीले है, मेरे संगीतज्ञ दोस्त....

खैर,
राह चलते चलते इनके साथ,
जब हालत के थपेड़ों से लड़ कर ठिठक जाता हूँ मैं,
तो इन चंदों में से कुछ चंद ना जाने कब मेरे बगल आ खड़े हो जाते हैं,
मेरे दुखते हुए मन को अपनी यारी के पंख से कुछ ऐसे सहलाते हैं,
खाना पीना भूलकर, सजना संवारना छोडकर, रंगीन रातों, किस्से कहानियों से मुंह मोड़कर
मेरे कांधे पे हाथ रख, चुपचाप ठहर जातें हैं,
कोई खून देता है, कोई वक़्त,
कोई मन सौंपता है, कोई प्रेम
ऐसे ही उनका हाथ थामे हुए, मेरे दिन दर दिन गुजरते हैं,
मेरे पागलपन में कुछ अपना रंग घोलते, हम संग-संग कड़ी दर कड़ी खोलते हैं
जैसे भी हैं, मेरे अपने है, मुझमे खुद को देखते हैं,
कोई उन्हे कैसा भी समझे, मेरे बचपन की रूह मे वो पलते हैं
चंद सी मुलाक़ातों में, चंद सी बातों मैं, वो चंद से चंद,
क्या करूँ मैं उनका? दोस्त जो हैं वो मेरे।

Saturday, 17 February 2018

वो चार लोग

(PC - Pixabay.com)

वो चार लोग

जब से होश संभाला है, जानती हूँ उन्हे
मिली हूँ पर मिली नहीं, देखा हैं पर देखा भी नहीं
पड़ोस में हैं पर पड़ोसी नहीं, दोस्ती तो है पर दोस्त नहीं
फिर भी जब वो बगल से मुझे ताड़ते हुए गुजरते हैं
तो ऐसा लगता है, भली भांति पहचानती हूँ उन्हे


फिक्रदार हैं मेरे, मुझे अपना मानते हैं
मेरे दुख मेरी खुशी को, मुझसे भी ज़्यादा वो जानते हैं
बाबा-माँ मेरे क्या खाक समझते है मेरे मन का रोग
मेरे जीवन के हर निर्णय पर अपना निर्णय देते हैं, वो चार लोग


तो Career क्या चुना बेटा तुमने?
Dramatics? अरे वो तो नौटंकी है
Writing? अमा, हर कोई गुलज़ार थोड़े ही ना बन पता है
Salon? लो भई, अब बिटिया आपकी नाई बनेगी
Modelling? ऐश्वर्या समझ रखा है खुद को, सूरत भी होनी चाहिए?
जो करो जैसे करो, बस ये याद रखना की चार लोग क्या कहेंगे?


और lifestyle क्या बना रखी है तुंमने?
छोटे कपड़े? ना ना....बुरी नज़र को है खुला आमंत्रण
Parties? तौबा तौबा…Drugs वगैरह भी लेती हो क्या?
Boyfriend? सवा सत्यानाश! इज्ज़त तो गई आपकी!
खाना नहीं बनाती? उफ, शादी कौन भला मानस करेगा?
जो करो जैसे करो, बस ये याद रखना की चार लोग क्या कहेंगे?


जी, मेरी जान के दुश्मन बस चार लोग!!
पहचानती तो नहीं पर उन चारो का चेहरा कुछ एक सा दिखता है
बताऊँ कैसा?
आँखें ज़रूर बड़ी हैं क्योंकि मेरी हर गुस्ताखी पे लाल हो खुल जाती हैं,
कुकुरनुमा कान है जो मेरी धीमी फुसफुसाहट पर खड़ा हो जाता है,
सूप नखा की नाक है, बात-बात में कट जाती है,
और दाँत नहीं बस सर्प डंक है, डसना जिसकी फ़ितरत है
जहां जाती हूँ, जिससे मिलती हूँ,
अपने आतंक से सब को डरा रखा है
Value Education की किताब हैं वो, भाई,
Moral Science का पाठ सबको पढ़ा रखा है
तुम होगे बड़े तीसमारखान, काम अनमोल किए होंगे
पर सही किया या गलत, प्रश्न तो ये है कि चार लोग क्या कहेंगे?


घर चलना आता है क्या तुम्हें?
Furniture! ये क्या ले आई, Durian लाना था ना?
Doctor! इन्हे क्यों दिखाया, डॉक्टर मिश्रा को दिखाना था ना?
Shopping! खुद ही कर आई, हमें भी बताना था ना?
Holiday! अरे, गर्मी में सिर्फ यूरोप ही जाना था ना? 


मेरे opinions पे भी उनके सवाल
Politics? सुधर जाओ, ज़्यादा communist बातों से पेट नहीं भरता
Religion? Atheist हो, नर्क में भी जगह नहीं मिलेगी
Gender? LGBT कोई gender है भला, तुम हिन्दू संस्कारो के नाम पर कलंक हो
Patriotism? छप्पन इंच का सीना सबसे ऊंची मिसाल है

और फिर उनके अनगिनत पर्सनल सवाल
इतनी उम्र हो गयी, शादी कब करोगी?
शादी को इतनी उम्र हो गयी, बच्चे कब करोगी?
एक बच्चे की उम्र हो चली, दूसरा कब करोगी?
दो बेटियों की उम्र हो गयी, अब एक बेटा कब करोगी?


सच तो ये है उम्र-दर-उम्र गुज़रती गयी, हर दिन इस डर में निकला कि वो क्या कहेंगे,
पर ना वो चार लोग खुश हुए,
ना उनके चार सवालों का हुआ अंत
पर समय रहते समझ गयी मैं,
और मैंने उनकी कोई बात ना मानी
उनके सवालों का कोई जवाब न दिया’,
बस वो किया जो ठीक था, वो किया जो सुंदर था
वो किया जो मन को लगा कि छोटा था पर मेरा था
नाराज़ हैं वो चार अब मुझसे,
अब घर मेरे नहीं आते, दरवाजा नहीं खटखटाते,
हर बात पे अपने opinions नहीं भिजवाते
मुझे नासमझ, अहंकारी और antisocial बुलाते हैं
मेरे निर्णय से उन्हे तकलीफ हो तो मेरे नाम का फ़तवा भी जारी कराते हैं
अब वो पड़ाव है  कि मुझे उनकी फिक्र नहीं,
और उनमे मेरा ज़िक्र नहीं
पर फिर भी उनमे एक दंभ है...


कहते हैं, कल जब मैं शिथिल पड़ जाऊँगी और मुझे आखिरी विदाई दी जाएगी
मैं रहूँ ना रहूँ, वो फिर से निकल के आएंगे
चार लोग...
बांस कि सेज पे मुझे कंधा देने, या मेरी मय्यत पर फूल चढ़ाने
पर उन चार कमजोर कंधो के ऊपर मैं rebellion का बोझ डालती हुई
अपने स्वाभिमानी जीवन की अकेली रचनाकर बन
अपनी हर कहानी स्वयं लिख सुनाऊँगी
चार कंधो पर तटस्थ बैठ एक बार फिर से हार के भी जीत जाऊगी
और जीत के भी हार जाएंगे मुझसे, मेरे अपने,
वो चार लोग।

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